नई दिल्ली: भारत और जर्मनी रक्षा सहयोग के नए दौर में प्रवेश करने जा रहे हैं। दोनों देशों के बीच कम से कम 8 अरब डॉलर (लगभग 70,000 करोड़ रुपये) की विशाल पनडुब्बी निर्माण डील को अंतिम रूप दिया जा रहा है, जो भारत की अब तक की सबसे बड़ी रक्षा खरीद सौदा बनेगा। इस समझौते में पहली बार पूर्ण तकनीक हस्तांतरण (टेक्नोलॉजी ट्रांसफर) का प्रावधान होगा, जिससे भारत में ही उन्नत पनडुब्बियों का निर्माण संभव हो सकेगा।
यह करार जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की 12-13 जनवरी की भारत यात्रा से पहले या दौरान पूरा होने की उम्मीद है। मर्ज अपनी पहली भारत यात्रा पर अहमदाबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे और फिर बेंगलुरु में जर्मन कंपनियों के कार्यक्रमों में शामिल होंगे। इस दौरान रक्षा, दवा उद्योग, व्यापार और यूरोपीय संघ-भारत फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर चर्चा प्रमुख रहेगी।
प्रस्तावित डील के तहत जर्मनी की थायसेंक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और भारत की सरकारी कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) मिलकर छह उन्नत पनडुब्बियां बनाएंगी। ये पनडुब्बियां टाइप 214 श्रेणी की होंगी, जिनमें एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम लगा होगा। इससे ये डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की तुलना में पानी के नीचे लंबे समय तक रह सकेंगी, जिससे हिंद महासागर में भारत की निगरानी और रणनीतिक ताकत बढ़ेगी—खासकर चीन की बढ़ती गतिविधियों के मद्देनजर।
वर्तमान में भारतीय नौसेना के पास पुरानी रूसी और फ्रांसीसी पनडुब्बियां हैं। इस डील से फ्रांस से अतिरिक्त तीन पनडुब्बियां खरीदने की योजना पर विराम लग सकता है। ‘मेक इन इंडिया’ की भावना के अनुरूप यह सौदा स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बड़ा बढ़ावा देगा। दोनों देशों के मंत्रालयों ने अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन सूत्रों के अनुसार बातचीत अंतिम चरण में है। मर्ज के साथ कई बड़े जर्मन उद्योगपति भी भारत आएंगे, जो द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाई देने का संकेत है। यह डील न केवल नौसेना को मजबूत करेगी, बल्कि भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी को भी गहरा बनाएगी।

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