दंतेवाड़ा : छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की जीवंत आदिवासी परंपराओं को दुनिया के सामने लाने का सिलसिला फिर शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने नए साल की शुरुआत में मां दंतेश्वरी मंदिर प्रांगण में विधिवत पूजा-अर्चना के बाद बस्तर पंडुम 2026 का लोगो और थीम गीत विमोचित किया। यह आयोजन न केवल सांस्कृतिक उत्सव है, बल्कि बस्तर की आत्मा को वैश्विक पटल पर स्थापित करने का मजबूत संकल्प भी दर्शाता है।
मुख्यमंत्री साय ने प्रदेशवासियों को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए कहा, “बस्तर पंडुम सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि हमारी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, कला और विरासत का जीवंत प्रतीक है। नृत्य-गीत से लेकर शिल्प, पारंपरिक व्यंजन और वन-औषधि तक – ये सब पीढ़ियों से हमारी पहचान रहे हैं।” उन्होंने पिछले साल के सफल आयोजन का जिक्र करते हुए बताया कि इस बार इसे और भव्य बनाया जा रहा है। राष्ट्रपति, केंद्रीय गृह मंत्री, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री के अलावा विभिन्न देशों के राजदूतों को भी न्योता भेजा जाएगा।
इस बार क्या है नया?
प्रतियोगिताओं की संख्या 7 से बढ़ाकर 12 कर दी गई है।
इसमें जनजातीय नृत्य, गीत, नाट्य, वाद्ययंत्र, वेशभूषा, आभूषण, पूजा-पद्धति के साथ-साथ शिल्प, चित्रकला, पारंपरिक व्यंजन-पेय, आंचलिक साहित्य और वन-औषधि शामिल हैं।
आयोजन तीन चरणों में: जनपद स्तर (10-20 जनवरी), जिला स्तर (24-29 जनवरी) और संभाग स्तर (2-6 फरवरी)।
पंजीयन अब ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीके से।
उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि ‘पंडुम‘ यानी पर्व की बस्तर में सदियों पुरानी परंपरा है और शांति की दिशा में प्रयास सफल हो रहे हैं। वन मंत्री केदार कश्यप और संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने भी इसे सांस्कृतिक संरक्षण का महत्वपूर्ण कदम बताया। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने आदिवासी समाज के प्रमुखों, मांझी-चालकी, पुजारी और पद्म सम्मानित कलाकारों से संवाद किया।
बस्तर संभाग के सात जिलों की हजारों ग्राम पंचायतों में फैले इस महोत्सव से न केवल कलाकारों को मंच मिलेगा, बल्कि बस्तर अब संस्कृति, शांति और विकास का नया प्रतीक बनेगा। मां दंतेश्वरी के आशीर्वाद से शुरू हुआ यह सफर बस्तर की जनजातीय धरोहर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा!


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